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अहसासों की आग दरम्यान ना रही

Posted On: 4 Jul, 2014 कविता में

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युही बैठे बैठे इक ख़याल आया है
क्यों जिंदगी अब उतनी आसान ना रही

इंसान की  इंसान से पहचान ना रही

रिश्तों में आज जैसे अब जान ना रही

कभी एक ही कमरे में सब साथ रहते थे
आज एक घर में रहने में भी शान ना रही
टुकड़ों की जिंदगी में सब टुकड़ों में बट गया
दिलो को तोड़ने में भी अब हानि ना रही
एक पल में टूट जाते है बरसो के बने रिश्ते
अब …अहसासों की वो आग दरम्यान ना रही

Web Title : अहसासों की आग दरम्यान ना रही



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pkdubey के द्वारा
July 5, 2014

आज के समाज का कडुवा सच आप ने कहा.सादर आभार और बधाई.

pratima के द्वारा
July 7, 2014

thankyou sir…बस मन की बात कागज़ पर आ गई ..


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