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ऐ माँ

Posted On: 5 May, 2015 Others,कविता,Junction Forum में

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ऐ माँ तुझसे ना मैंने कभी,

अपना प्रेम जताया

फिर भी अपने हर हिस्से में,
मैंने तुझको ही पाया

कल जब मैं तेरी गुड़िया थी
पलकों पे बिठा कर रखा
आज भी अपनी खुशियों पर तूने,
मेरा नाम लिखा
अपनी खुशियों में हर पल मैने
तुझको हँसता पाया
ऐ माँ , बस अपना प्रेम न अबतक
मैंने तुझसे कभी जताया

आज मैं बैठी दूर यहाँ
खुद में मशगूल हुई हूँ
तुझको लगे ये शायद मैं
तुझको भूल गई हूँ
लेकिन, जब भी तु याद है आई
इन आँखों में अश्क है आया
मैं इक पल तुझसे दूर नही माँ,
मैं तेरा हूँ सरमाया

माँ जग की ये रीत बुरी
जो मुझे पराया कहती हैं
ऐ माँ तू आज भी मेरे,
रोम रोम में रहती है
मैं कैसे चुकाऊ क़र्ज़ तेरा,
तूने मुझको ऋणी बनाया
ना देखे वो बच्चे जिसने
माँ का क़र्ज़ चुकाया

“तुझसे दूरी का दर्द मैं,
कैसे तुझे बताऊ
तू मेरी है फिर भी ,
मैं तेरी ना कहलाऊ
इस जनम हूँ तेरी बेटी मैं,
फिर,बेटी बनकर ही आऊ
जब जब जनम मिले ऐ माँ..
मैं तेरी ही कहलाऊ ,,

Web Title : ऐ माँ

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

May 6, 2015

बहुत सुन्दर व् प्यारी अभिव्यक्ति प्रतिमा जी .

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
May 7, 2015

मां पर आपकी यह बेहद प्यारी, भावपूर्ण कविता अच्छी लगी ।

Shobha के द्वारा
May 7, 2015

 प्रिय प्रतिमा आपकी कविता पढ़ कर माँ याद आ गई सबका यही रिएक्शन होगा बड़ी प्यारी कविता  डॉ शोभा

pratima के द्वारा
May 15, 2015

बहुत बहुत धन्यवाद और आभार आपका ..

pratima के द्वारा
May 15, 2015

धन्यवाद शालिनी जी..

pratima के द्वारा
May 15, 2015

धन्यवाद सर..


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